विशेष ग्राउंड रिपोर्ट
देवघर में सावन से ठीक पहले शिवगंगा का जल हरा होने और प्रशासनिक अव्यवस्था पर वरिष्ठ पत्रकार तरुण कुमार कंचन की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। जानिए क्या कहती है वैज्ञानिकों की जल परीक्षण रिपोर्ट।
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
महादेव की नगरी देवघर देश में अपनी अनूठी धार्मिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। द्वादश ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ माता की शक्तिपीठ इस भूमि के आध्यात्मिक महत्व को और अधिक बढ़ा देती है। बाबाधाम मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का पहला पड़ाव 'शिवगंगा' होता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही पवित्र सरोवर है जिसे रावण ने अपनी मुष्टि (मुक्के) के प्रहार से उत्पन्न किया था, ताकि शिवलिंग को स्पर्श करने से पहले वह स्वयं को शुद्ध कर सके। यह परंपरा आज भी अनवरत जारी है। यहाँ स्नान के बाद ही बाबा भोलेनाथ के दर्शन को पूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि शिवगंगा में डुबकी लगाए बिना बाबा का आशीर्वाद अधूरा रहता है।
इसी अटूट विश्वास के साथ देश के कोने-कोने से आने वाले हजारों श्रद्धालु हर दिन यहाँ डुबकी लगाते हैं। पंडा समाज द्वारा यहाँ श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न कराए जाते हैं। इस कारण शिवगंगा केवल अगाध आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल भी है। परंतु, इन दिनों इस पावन सरोवर की पवित्रता पर अव्यवस्था की गंभीर छाया मंडरा रही है।
सावन सिर पर, पर अधूरी हैं तैयारियां
विश्वप्रसिद्ध श्रावणी मेला शुरू होने में अब कुछ ही दिन शेष रह गए हैं, लेकिन शिवगंगा की सफाई धरी की धरी रह गई है। जमीनी स्तर पर न तो सफाई दिख रही है और न ही व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं। विडंबना यह है कि इस संबंध में कोई भी जिम्मेदार अधिकारी कैमरे या मीडिया के सामने कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं है।
कागजों और बैठकों का दौर जारी है; सभी अधिकारी और जनप्रतिनिधि श्रद्धालुओं को ज्यादा से ज्यादा सहूलियत देने के नाम पर मैराथन बैठकें कर रहे हैं, पर धरातल पर काम शून्य नजर आता है। अधिकारी वर्ग ने मीडिया से दूरी बना रखी है और केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ रहा है। नतीजतन, न तो जनता के सवालों का समाधान हो रहा है और न ही अधिकारी अपनी जवाबदेही तय कर रहे हैं।
डरावनी रिपोर्ट: पानी में मिला 'मल जनित बैक्टीरिया'
शिवगंगा के जल की शुद्धता को लेकर पूर्व में हुए वैज्ञानिक परीक्षणों की रिपोर्ट बेहद चिंताजनक रही है।
· BARC की जांच: साल 2014-15 में झारखंड सरकार की पहल पर 'भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर' (BARC) के वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम ने देवघर आकर जल का विस्तृत परीक्षण किया था। वैज्ञानिकों ने खुलासा किया था कि अत्यधिक मात्रा में डिटर्जेंट, साबुन और जैविक कचरे के कारण पानी में हानिकारक रसायनों और बैक्टीरिया का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है। इससे श्रद्धालुओं को त्वचा से जुड़ी गंभीर बीमारियां (Skin Diseases) होने का बड़ा खतरा है। इसी रिपोर्ट के आधार पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की तर्ज पर यहाँ करीब 11 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक 'फिल्ट्रेशन और ओजोन ट्रीटमेंट प्लांट' की नींव रखी गई थी, जिसकी वास्तविक स्थिति आज बदहाल है।
· शोध पत्रिकाओं के चौंकाने वाले आंकड़े: 'इंडियन जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च' और 'CABI डिजिटल लाइब्रेरी' में प्रकाशित शोध रिपोर्टों के अनुसार, शिवगंगा के पानी का pH मान सर्दियों में 5.8 से 6.5 (अम्लीय) और गर्मियों में 6.9 से 7.3 के बीच पाया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जांच में पानी के भीतर Total Coliform और Fecal Coliform (मल जनित बैक्टीरिया) की भारी उपस्थिति पाई गई, जिसका मुख्य कारण अनियंत्रित स्नान और कपड़े धोना है।
हालांकि, जल शोधन संयंत्र को समय-समय पर चलाया जाता है (जैसा कि लॉकडाउन के दौरान भीड़ न होने से पानी काफी साफ हो गया था), लेकिन स्थानीय मीडिया और प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार, कड़े नियमों के अभाव में डिटर्जेंट का धड़ल्ले से उपयोग और काई की समस्या जल की गुणवत्ता को लगातार प्रभावित कर रही है।

स्थानीय निवासियों और पंडा समाज में भारी आक्रोश
स्थानीय लोगों का दर्द है कि शिवगंगा केवल उनके लिए एक जलाशय नहीं, बल्कि जीवनदायिनी है। वर्तमान में स्थिति ऐसी बदतर हो चुकी है कि कोई सामान्य व्यक्ति इसमें स्नान करने की हिम्मत न करे। पानी पूरी तरह हरा हो चुका है और तलहटी में मोटी काई जमी है। शिवगंगा के बाहर का बुनियादी काम भी अधूरा है और वर्तमान में नाली का निर्माण कराया जा रहा है।
स्थानीय निवासी बमबम पंडा कहते हैं:
इस बार सावन शुरू होने वाला है और शिवगंगा का जल विषैला और हरा हो चुका है। यह आचमन तो दूर, स्नान के लायक भी नहीं है। ऐसे में हम धार्मिक अनुष्ठान कैसे संपन्न कराएं? मजबूरी में हम लोग इसी जल से अपनी दिनचर्या शुरू और खत्म करते हैं। ऐन वक्त पर घाटों को तोड़ा जा रहा है, जिसे 20 दिनों में दोबारा नहीं बनाया जा सकता। जब लाखों की भीड़ उमड़ेगी, तो प्रशासन उन्हें कैसे संभालेगा? क्या सब कुछ भगवान शिव के भरोसे छोड़ दिया गया है?"
बताते चलें कि शिवगंगा को पूरी तरह सुखाकर उससे कीचड़ निकालने का ऐतिहासिक कार्य आखिरी बार वर्ष 1999 में हुआ था। इसके बाद 2017 में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट भी चालू किया गया, पर वर्तमान में इसका कोई लाभ नहीं दिख रहा है। पंडा धर्मरक्षणी सभा के उपाध्यक्ष चंद्रशेखर खवाड़े प्रशासन पर सीधा आरोप लगाते हुए कहते हैं कि प्रशासन सफाई के नाम पर सिर्फ 'मलाई काट' रहा है, वास्तव में धरातल पर कोई काम नहीं हो रहा है, जिससे भ्रष्टाचार की बू आती है।
प्रशासनिक दावा: 'स्वच्छ देवघर अभियान' और अपील
इन तमाम आरोपों के बीच, जिला प्रशासन और नगर निगम का अपना एक अलग पक्ष है। मई 2026 में प्रशासन द्वारा संयुक्त रूप से एक बड़ा 'विशेष सफाई जागरूकता अभियान' चलाया गया था।
अधिकारियों का आधिकारिक बयान: प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, आगामी श्रावणी मेले को ध्यान में रखते हुए बाबा मंदिर के आसपास के पूरे परिक्षेत्र को अलग-अलग ज़ोन में विभाजित किया गया है। इसमें शिवगंगा और जलसार क्षेत्र को सबसे प्रमुख और संवेदनशील ज़ोन के रूप में चिन्हित कर सफाई के विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं।
·जनता से सहयोग की अपील: प्रशासन का कहना है कि सिर्फ सरकारी प्रयासों से शत-प्रतिशत सफाई संभव नहीं है। इसमें तीर्थयात्रियों और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी अहम है। प्रशासन ने अपील की है कि लोग शिवगंगा क्षेत्र में प्रतिबंधित पॉलिथीन और साबुन-डिटर्जेंट का उपयोग न करें, ताकि पानी की रसायनिक गुणवत्ता और धार्मिक पवित्रता बनी रहे।
निष्कर्ष
एक तरफ जहां जिला प्रशासन 'ज़ोनिंग' और 'जन-भागीदारी' का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारियों को मुकम्मल बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर हरा पानी, टूटे हुए घाट और अधूरी कंक्रीट संरचनाएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। हर साल शिवगंगा की साफ-सफाई के नाम पर स्वीकृत होने वाला मोटा बजट आखिर कहाँ जा रहा है, यह जांच का विषय है। सावन के चंद दिन बचे हैं, ऐसे में बाबा के भक्तों को स्वच्छ जल मुहैया कराना प्रशासन के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।
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