रांची में JPSC-JSSC अभ्यर्थियों पर पुलिस लाठीचार्ज और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के संदेश पर वरिष्ठ पत्रकार आनंद सिंह का विशेष विश्लेषण व संपादकीय दृष्टिकोण।
छात्रों के जख्म और मुख्यमंत्री की पुलिस-प्रशंसा के बीच खड़ा एक बड़ा सवाल
झारखंड की राजनीति में इन दिनों सबसे बेचैन करने वाली तस्वीर विधानसभा के बाहर दिखाई दे रही है। एक तरफ रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे युवा हैं, तो दूसरी तरफ लोकतंत्र की दुहाई देती सरकार और उसके बीच तनी पुलिस की लाठियां।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि छात्रों ने बैरिकेडिंग क्यों तोड़ी या पुलिस ने बल प्रयोग क्यों किया। असली सवाल यह है कि जब सरकार स्वयं कह रही है कि छात्रों की आवाज सुनना उसकी जिम्मेदारी है, तब उसी आवाज को लाठी, आंसू गैस और वॉटर कैनन से दबाने की नौबत क्यों आई?
10 अगस्त को रांची में JPSC-JSSC से जुड़ी कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन विधानसभा घेराव के दौरान हिंसक टकराव में बदल गया। पुलिस ने वॉटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लिया, तो वहीं छात्रों की ओर से भी बैरिकेडिंग तोड़ने और पथराव के दावे किए गए। इस टकराव में कई छात्र घायल हुए। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू पुलिस कार्रवाई से भी आगे का है—घटनाक्रम के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का संदेश।
मुख्यमंत्री ने स्थिति संभालने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की पीठ थपथपाई और उन्हें धन्यवाद दिया। साथ ही उन्होंने छात्रों से कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने का उन्हें अधिकार है, सरकार उनकी आवाज का सम्मान करती है और उनकी मांगों पर गंभीरता से कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने संवाद और विश्वास के रास्ते समाधान निकालने का आश्वासन भी दिया।
यह संदेश पढ़ने में अत्यंत संवेदनशील लगता है। भाषा में युवाओं के प्रति सम्मान है, लोकतंत्र का उल्लेख है, संवाद की बात है और परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी, तकनीक-सक्षम व सुरक्षित बनाने का संकल्प भी है। लेकिन फिर वही यक्ष प्रश्न खड़ा होता है—यह सब उसी दिन क्यों कहा गया, जिस दिन उन्हीं छात्रों पर पुलिस की लाठियां चटकी थीं?
सरयू राय ने पकड़ी समस्या की नब्ज
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने मुख्यमंत्री को जो सलाह दी है, वह इस पूरे प्रकरण को समझने का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक नजरिया पेश करती है। उन्होंने कहा कि राज्यहित में छात्र आंदोलन का शीघ्र समाधान जरूरी है। मुख्यमंत्री को कूटनीतिक पैंतरेबाजी के बजाय छात्रों से सीधे संपर्क करना चाहिए, उनकी विधिसम्मत मांगों को स्वीकार करने की एकतरफा घोषणा करनी चाहिए और युवाओं के भविष्य से जुड़ी चिंताओं का समाधान करना चाहिए। साथ ही उन्होंने आंदोलन के आईने में सरकारी भ्रष्टाचार की व्यापक झलक महसूस करने की बात भी कही।
सरयू राय के इस बयान को महज विपक्षी राजनीति मानकर खारिज करना आसान हो सकता है। लेकिन क्या इसे इतनी आसानी से दरकिनार किया जा सकता है? यदि 17 दिनों से छात्र आंदोलन कर रहे हों, परीक्षा और भर्ती की विश्वसनीयता दांव पर हो और अंततः विधानसभा की ओर बढ़ते युवाओं पर बल प्रयोग करना पड़े—तो यह किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। सरकार को सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि स्थिति यहां तक पहुंची कैसे?
लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व केवल यह तय करना नहीं होता कि टकराव में पहले आगे कौन बढ़ा; उसका प्राथमिक दायित्व यह भी है कि टकराव की नौबत ही क्यों आई, और इसकी राजनीतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी तय की जाए।
सीएम का ट्वीट और जमीनी हकीकत: दो विरोधाभासी तस्वीरें
मुख्यमंत्री का संदेश कहता है: आपकी आवाज का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है।
सड़क की तस्वीर कहती है: आपकी आवाज को रोकने के लिए बैरिकेड्स, वॉटर कैनन, आंसू गैस और लाठियां तैनात हैं।
मुख्यमंत्री कहते हैं: आइए, संवाद और विश्वास के साथ समाधान निकालें।
छात्र पूछ सकते हैं: अगर संवाद ही समाधान है, तो संवाद के लिए बढ़ते कदमों के आगे लाठियां क्यों खड़ी थीं?
मुख्यमंत्री का कहना है कि वरिष्ठ मंत्री लगातार छात्रों से संवाद कर रहे हैं। यह सराहनीय है, लेकिन यदि 17 दिन के आंदोलन के बाद भी छात्र सड़कों पर हैं, तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सरकार का संवाद युवाओं को आश्वस्त नहीं कर सका। यही वह बिंदु है जहां कूटनीति के स्थान पर सीधे संवाद की जरूरत महसूस होती है। मुख्यमंत्री को स्वयं छात्रों के बीच जाकर एक-एक मांग पर स्पष्टता से बात करनी चाहिए थी।
पुलिस की पीठ थपथपाने पर उठे सवाल
सबसे ज्यादा असहज करने वाली बात मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस-प्रशासन को धन्यवाद देना है। निस्संदेह, कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का कर्तव्य है। यदि उपद्रव हुआ, तो कार्रवाई जरूरी थी। लेकिन क्या बल प्रयोग अनुपातिक और सीमित था? क्या महिलाओं और छात्रों पर हुए बल प्रयोग की निष्पक्ष जांच होगी? कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का काम है, लेकिन पुलिस की हर कार्रवाई को बिना समीक्षा के सही ठहरा देना मुख्यमंत्री का कर्तव्य नहीं हो सकता।
इस घटनाक्रम पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी चिंता जताई। चूकि झारखंड में कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है, इसलिए उनकी यह टिप्पणी सरकार को राजनीतिक रूप से असहज करती है। सवाल किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि सिद्धांत का है—क्या सत्ता में रहते हुए बल प्रयोग सही और विपक्ष में रहते हुए वही गलत हो जाता है?
समाधान का सही रास्ता
छात्रों की हर मांग मान लेना संभव या उचित नहीं हो सकता; परीक्षा रद्द करने या सीबीआई जांच कराने के कानूनी और प्रशासनिक पहलू होते हैं। लेकिन जो मांगें कानून सम्मत और जनहित में हैं, उन्हें तुरंत स्वीकार करने में सरकार की कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी नैतिक मजबूती दिखेगी।
जब भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान युवा पीढ़ी के भरोसे को होता है। सालों की मेहनत और आर्थिक तंगी के बीच पढ़ाई करने वाले छात्र के पास जब न्याय की उम्मीद कमजोर होती है, तो आंदोलन ही रास्ता बचता है। यदि आंदोलन को लाठी से जवाब मिलेगा, तो यह अविश्वास और गहरा होगा।
अब वक्त बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स का नहीं, बल्कि ठोस निर्णयों का है। लाठी से आंदोलन को कुछ देर के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन युवाओं के मन में उपजे अविश्वास को नहीं। आज झारखंड की सड़कें यही सवाल पूछ रही हैं, मुख्यमंत्री जी, अगर छात्रों की आवाज सचमुच आपकी प्राथमिकता है, तो उस आवाज तक पहुंचने से पहले लाठियां किसने खड़ी कीं?
- लेखक -वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक हैं।
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