झारखंड उच्च न्यायालय ने दहेज हत्या (IPC धारा 304B) के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी पति राजेंद्र चौधरी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहली पत्नी से तलाक न होने का तर्क देकर दूसरी पत्नी को प्रताड़ित करने और सजा से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दुमका सत्र अदालत द्वारा दी गई 9 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार।


रांची। पहली पत्नी से औपचारिक तलाक न होने का कानूनी बहाना बनाकर दूसरी पत्नी की दहेज हत्या के आपराधिक दायित्व से बचने की कोशिश कर रहे पति को झारखंड उच्च न्यायालय से करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने अभियुक्त राजेंद्र चौधरी की अपील को सिरे से खारिज करते हुए दुमका की सत्र अदालत द्वारा वर्ष 2005 में सुनाई गई 9 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है।


न्यायालय ने राजेंद्र चौधरी को दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण (Surrender) कर शेष सजा भुगतने का सख्त आदेश दिया है। इसके साथ ही, अपील लंबित रहने के दौरान अभियुक्त को मिली सजा के निलंबन (Suspension of Sentence) की सुविधा भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई है।


"पहली पत्नी से तलाक नहीं हुआ था, इसलिए दूसरी शादी कानूनी नहीं थी, पति का यह तर्क कोर्ट में फेल रहा।

आरोपी को 2 महीने में ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने के निर्देश। वर्ष 1997 में बासुकीनाथ मंदिर में हुई थी शादी, 1999 में संदिग्ध परिस्थिति में हुई थी मौत।


न्यायमूर्ति प्रदीप श्रीवास्तव की एकल पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, राजेंद्र चौधरी की पहली शादी सरिता देवी से हुई थी। दोनों से कोई संतान नहीं थी। इसके बाद राजेंद्र ने संतान प्राप्ति की बात कहकर चंद्रिका के पिता से संपर्क किया था।

वर्ष 1997 में दुमका स्थित प्रसिद्ध बासुकीनाथ मंदिर में राजेंद्र ने चंद्रिका से शादी की। शादी के बाद राजेंद्र की पहली पत्नी सरिता भी उसी के साथ रहती रही।

दूसरी शादी के करीब दो साल तक चंद्रिका का वैवाहिक जीवन सामान्य रहा। इसके बाद खेतों की सिंचाई के लिए ससुराल वालों की नीयत बदल गई और उन्होंने सिंचाई पंपसेट की मांग शुरू कर दी।


आरोप था कि राजेंद्र और उसके पिता चंद्रिका के मायके वालों पर पंपसेट देने का लगातार दबाव बना रहे थे। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मायके वाले यह मांग पूरी करने में असमर्थ रहे, जिसके बाद चंद्रिका को शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। चंद्रिका ने अपने परिजनों को इस प्रताड़ना की जानकारी दी थी। अदालत में अभियोजन के चार गवाहों ने भी पंपसेट की मांग और प्रताड़ना की पुष्टि की, जिसे हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि का मुख्य आधार माना।


30 दिसंबर 1999 को चंद्रिका खेत में काम करने के बाद घर लौटी थी। घर आने के कुछ ही देर बाद वह अचानक कांपने लगी और बेसुध होकर गिर पड़ी। परिजन उसे इलाज के लिए ले गए, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।

मायके वालों ने जब शव देखा तो चंद्रिका के मुंह और नाक से झाग निकल रहा था, जिससे उन्हें जहर दिए जाने की आशंका हुई। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का स्पष्ट कारण सामने नहीं आया और शरीर पर चोट के निशान भी नहीं मिले। विसरा सुरक्षित रखा गया था, लेकिन जांच अधिकारी की लापरवाही के कारण उसे रासायनिक जांच (Viscera Report) के लिए भेजे जाने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं मिला।


हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि "यदि मेडिकल रिपोर्ट में मौत का सटीक कारण स्पष्ट न भी हो, तब भी यदि यह साबित हो जाता है कि मृत्यु से ठीक पहले महिला को दहेज की मांग को लेकर क्रूरता और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था, तो अभियोजन का मामला समाप्त नहीं होता।"


दुमका की सत्र अदालत ने वर्ष 2005 में राजेंद्र चौधरी को आईपीसी की धारा 304बी (दहेज हत्या) के तहत दोषी ठहराते हुए 9 साल की सजा सुनाई थी। लगभग 27 साल बाद हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालत की सजा को पूरी तरह न्यायसंगत ठहराया।


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