गोरखपुर में 26 जनवरी 1998 को आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह की एक अनमोल याद, जब गोरक्षपीठ के युवा संन्यासी योगी आदित्यनाथ मुख्य अतिथि बने। जानिए उनके मुख्यमंत्री बनने से ठीक पहले के इस ऐतिहासिक और अविस्मरणीय पल की पूरी कहानी।
मुर्तजा हुसैन रहमानी, गोरखपुर।
कुछ तस्वीरें सिर्फ कैमरे में कैद चेहरे नहीं होतीं, बल्कि वे समय की अमानत बन जाती हैं। उनमें बीते दौर की खुशबू, यादों की गर्माहट और इतिहास की आहट एक साथ महसूस होती है। ऐसी ही एक अनमोल तस्वीर मेरे जीवन की सबसे कीमती यादों में शामिल है।
यह तस्वीर 26 जनवरी 1998 की है। उस दिन भारत पत्रकार समिति के तत्वावधान में जाफरा बाजार स्थित शीश महल में आयोजित गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण समारोह में हमारे विशेष आमंत्रण पर गोरक्षपीठ के तत्कालीन उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ जी पधारे थे। उस समय शायद किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि मंच पर मौजूद यह तेजस्वी युवा संन्यासी आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक प्रमुख चेहरा बन जाएगा।
उस दिन का वातावरण राष्ट्रभक्ति, आत्मीयता और परस्पर सम्मान से ओत-प्रोत था। तिरंगा अपनी पूरी शान से लहरा रहा था, राष्ट्रगान की गूंज हर दिल में उत्साह भर रही थी और समारोह में उपस्थित हर व्यक्ति उस ऐतिहासिक पल का साक्षी बन रहा था। योगी आदित्यनाथ जी का सरल, सौम्य और प्रभावशाली व्यक्तित्व सभी का ध्यान आकर्षित कर रहा था। समय ने भी जैसे उस दिन एक नई कहानी लिखनी शुरू कर दी थी।
इस समारोह के लगभग एक माह बाद, 3 मार्च 1998 को योगी आदित्यनाथ पहली बार 12वीं लोकसभा के लिए सांसद निर्वाचित हुए। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि वह तस्वीर केवल एक समारोह की स्मृति नहीं थी, बल्कि भविष्य के इतिहास की पहली झलक भी थी।
आज वही योगी आदित्यनाथ जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में करोड़ों लोगों का नेतृत्व कर रहे हैं। एक संन्यासी से जननेता तक की उनकी यात्रा संकल्प, अनुशासन, सेवा और नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
इस अविस्मरणीय अवसर के साक्षी भारत पत्रकार समिति के तत्कालीन प्रदेश उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष मिश्र सहित अनेक पत्रकार साथी भी रहे। जब भी इस तस्वीर पर नजर पड़ती है, वह दौर, वह सादगी, वह आत्मीयता और वह राष्ट्रभक्ति फिर से आंखों के सामने जीवंत हो उठती है।
कुछ तस्वीरें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर गुजरते साल के साथ उनका महत्व और भी बढ़ जाता है।
कुछ लम्हे बीतकर भी नहीं बीतते,
वे इतिहास के पन्नों पर रोशन इबारत बनकर हमेशा जिंदा रहते हैं।
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